हां माँ तुम हो वह अमृत ,
जो हर पल कराती हमें तुम पान।
हां माँ तुम हो वह दुलार ,जो सिखाता हमें करो सदा उपकार ।
हां माँ तुम हो वह शक्ति ,
जो करता हमारी रक्षा बन कर ढाल ।
हां माँ तुम हो बड़ी अनमोल,
जो भी हो नहीं लगा सकता उसका कोई मोल।
हां माँ तुम हो दया का सागर,
जो भी हो जैसा भी हो सदा अपने में लेती समा ।
हां माँ तुम ही हो वह पवित्र धाम ,
जो देता सदा हमें आनंद और विश्राम ।
हां माँ तुम हो अंतर्यामी ,
जो ना कहकर भी सब कुछ लेती सुन।
हां माँ तुम्हारा नहीं कोई तोड़,
जो देती जन्म एक जीव को अपनी अतडियां मरोड़।
हां माँ तुम हो धन्य धन्य,
जो नहीं पा सकते खर्च कर कितना भी धन।
जो भी लिखूँ होगा ही बहुत कम,
क्योंकि वो तो है ही ईश्वर की तरह अनंत।।।।
वीणा साबू
9/5/21
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